read bhagwat geeta in hindi
मार्ठ07, 2019
Read Bhagwat Geeta In Hindi
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ą¤ą¤्तियोą¤- ठध्याय 12
ą„§-ठर्ą¤ुन ą¤ą¤µाą¤
ą¤ą¤µं सततयुą¤्ता ये ą¤ą¤्तास्त्वां पर्युपासते।
ये ą¤ाप्यą¤्षरमव्यą¤्तं तेषां ą¤े योą¤ą¤µित्तमाः।
ą„Ø-श्रीą¤ą¤ą¤µानुवाą¤
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुą¤्ता ą¤ą¤Ŗासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युą¤्ततमा मताः।
ą„©-ये त्वą¤्षरमनिर्देश्यमव्यą¤्तं पर्युपासते।
सर्वत्ą¤°ą¤ą¤®ą¤िन्त्यं ठą¤ूą¤ą¤ø्ą¤„ą¤®ą¤ą¤²ं ध्रुवम्।
ą„Ŗ-सन्नियम्येन्द्रियą¤्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वą¤ूतहिते रताः।
ą„«-ą¤्लेशोऽधिą¤ą¤¤ą¤°ą¤ø्तेषामव्यą¤्तासą¤्तą¤ेतसाम्।
ठव्यą¤्ता हि ą¤ą¤¤िर्दुःą¤ं देहवद्ą¤िरवाप्यते।
ą„¬-ये तु सर्वाणि ą¤ą¤°्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः।
ठनन्येनैव योą¤ेन मां ध्यायन्त ą¤ą¤Ŗासते।
ą„-तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसाą¤ą¤°ात्।
ą¤ą¤µामि नą¤िरात्पार्ऄ मय्यावेशितą¤ेतसाम्।
ą„®-मय्येव मन ą¤ą¤§ą¤¤्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव ठत ą¤ą¤°्ध्वं न संशयः।
ą„Æ-ठऄ ą¤ित्तं समाधातुं न शą¤्रोषि मयि स्ऄिरम्।
ठą¤्यासयोą¤ेन ततो मामिą¤्ą¤ाप्तुं धनą¤्ą¤ą¤Æ।
ą„§ą„¦-ठą¤्यासेऽप्यसमर्ऄोऽसि मत्ą¤ą¤°्मपरमो ą¤ą¤µ।
मदर्ऄमपि ą¤ą¤°्माणि ą¤ुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि।
ą„§ą„§-ठऄैतदप्यशą¤्तोऽसि ą¤ą¤°्तुं मद्योą¤ą¤®ाश्रितः।
सर्ą¤µą¤ą¤°्मफलत्याą¤ं ततः ą¤ुरु यतात्मवान्।
ą„§ą„Ø-श्रेयो हि ą¤्ą¤ानमą¤्यासाą¤्ą¤्ą¤ानाद्धयानं विशिष्यते।
ध्यानात्ą¤ą¤°्मफलत्याą¤ą¤ø्त्याą¤ाą¤्ą¤ान्तिरनन्तरम्।
ą„§ą„©-ठद्वेष्ą¤ा सर्वą¤ूतानां मैत्रः ą¤ą¤°ुण ą¤ą¤µ ą¤।
निर्ममो निरहą¤्ą¤ारः समदुःą¤ą¤øुą¤ः ą¤्षमी।
ą„§ą„Ŗ-संतुष्ą¤ः सततं योą¤ी यतात्मा दृढ़निश्ą¤ą¤Æः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्ą¤ą¤्तः स मे प्रियः।
ą„§ą„«-यस्मान्नोद्विą¤ą¤¤े लोą¤ो लोą¤ान्नोद्विą¤ą¤¤े ठयः।
हर्षामर्ą¤·ą¤ą¤Æोद्वेą¤ैर्मुą¤्तो यः स ठमे प्रियः।
ą„§ą„¬-ठनपेą¤्षः शुą¤िर्दą¤्ष ą¤ą¤¦ासीनो ą¤ą¤¤ą¤µ्यऄः।
सर्वारम्ą¤ą¤Ŗą¤°ित्याą¤ी यो मद्ą¤ą¤्तः स मे प्रियः।
ą„§ą„-यो न हृष्यति न द्वेष्ą¤ि न शोą¤ą¤¤ि न ą¤ाą¤्ą¤्षति।
शुą¤ाशुą¤ą¤Ŗą¤°ित्याą¤ी ą¤ą¤्तिमान्यः स मे प्रियः।
ą„§ą„®-समः शत्रौ ठमित्रे ठतऄा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुą¤ą¤¦ुःą¤ेषु समः सą¤्ą¤ą¤µिवर्ą¤ितः।
ą„§ą„Æ-तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्ą¤ो येन ą¤ेनą¤ित्।
ठनिą¤ेतः स्ऄिरमतिर्ą¤ą¤्तिमान्मे प्रियो नरः।
ą„Øą„¦-ये तु धर्म्यामृतमिदं यऄोą¤्तं पर्युपासते।
श्रद्धाना मत्परमा ą¤ą¤्तास्तेऽतीव मे प्रियाः।
ठर्ą¤ुन बोले- ą¤ो ą¤ी ठनन्य प्रेमी ą¤ą¤्ą¤¤ą¤ą¤Ø पूर्वोą¤्त प्रą¤ार से निरन्तर ą¤ą¤Ŗą¤े ą¤ą¤ą¤Ø-ध्यान में लą¤े ą¤°ą¤¹ą¤ą¤° ą¤ą¤Ŗ सą¤ुण रूप परमेश्वर ą¤ो ą¤ą¤° दूसरे ą¤ो ą¤ेवल ठविनाशी सą¤्ą¤िदानन्ą¤¦ą¤ą¤Ø निराą¤ार ब्रह्म ą¤ो ही ठतिश्रेष्ठą¤ाव से ą¤ą¤ą¤¤े हैं- ą¤ą¤Ø दोनों प्रą¤ार ą¤े ą¤ą¤Ŗासą¤ों में ठति ą¤ą¤¤्तम योą¤ą¤µेत्ता ą¤ौन हैं?
श्री ą¤ą¤ą¤µान बोले- मुą¤ą¤®ें ą¤ो मन ą¤ो ą¤ą¤ाą¤्र ą¤ą¤°ą¤े निरंतर मेरे ą¤ą¤ą¤Ø-ध्यान में लą¤े हुठą¤ो ą¤ą¤्ą¤¤ą¤ą¤Ø ठतिशय श्रेष्ठश्रद्धा से युą¤्त होą¤ą¤° मुठसą¤ुणरूप परमेश्वर ą¤ो ą¤ą¤ą¤¤े हैं, वे मुą¤ą¤ो योą¤ियों में ठति ą¤ą¤¤्तम योą¤ी मान्य हैं।
परन्तु ą¤ो पुरुष ą¤ą¤Ø्द्रियों ą¤े समुदाय ą¤ो ą¤ą¤²ी प्रą¤ार वश में ą¤ą¤°ą¤े मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, ą¤ ą¤ą¤„नीय स्वरूप ą¤ą¤° सदा ą¤ą¤ą¤°ą¤ø रहने वाले, नित्य, ą¤ ą¤ą¤², निराą¤ार, ठविनाशी, सą¤्ą¤िदानन्ą¤¦ą¤ą¤Ø ब्रह्म ą¤ो निरन्तर ą¤ą¤ीą¤ाव से ध्यान ą¤ą¤°ą¤¤े हुą¤ ą¤ą¤ą¤¤े हैं, वे सम्पूर्ण ą¤ूतों ą¤े हित में रत ą¤ą¤° सबमें समान ą¤ाववाले योą¤ी मुą¤ą¤ो ही प्राप्त होते हैं।
ą¤ą¤Ø सą¤्ą¤िदानन्ą¤¦ą¤ą¤Ø निराą¤ार ब्रह्म में ą¤ą¤øą¤्त ą¤ित्तवाले पुरुषों ą¤े साधन में परिश्रम विशेष है ą¤्योंą¤ि देहाą¤िमानियों द्वारा ठव्यą¤्तविą¤·ą¤Æą¤ ą¤ą¤¤ि दुःą¤ą¤Ŗूर्वठप्राप्त ą¤ी ą¤ाती है।
परन्तु ą¤ो मेरे परायण रहने वाले ą¤ą¤्ą¤¤ą¤ą¤Ø सम्पूर्ण ą¤ą¤°्मों ą¤ो मुą¤ą¤®ें ठर्पण ą¤ą¤°ą¤े मुठसą¤ुणरूप परमेश्वर ą¤ो ही ठनन्य ą¤ą¤्तियोठसे निरन्तर ą¤िन्तन ą¤ą¤°ą¤¤े हुą¤ ą¤ą¤ą¤¤े हैं।
हे ठर्ą¤ुन! ą¤ą¤Ø मुą¤ą¤®ें ą¤ित्त लą¤ाने वाले प्रेमी ą¤ą¤्तों ą¤ा मैं शीą¤्र ही मृत्यु रूप संसार-समुद्र से ą¤ą¤¦्धार ą¤ą¤°ą¤Øे वाला होता हूँ।
मुą¤ą¤®ें मन ą¤ो लą¤ा ą¤ą¤° मुą¤ą¤®ें ही बुद्धि ą¤ो लą¤ा, ą¤ą¤øą¤े ą¤ą¤Ŗą¤°ान्त तू मुą¤ą¤®ें ही निवास ą¤ą¤°ेą¤ा, ą¤ą¤øą¤®ें ą¤ुठą¤ी संशय नहीं है।
यदि तू मन ą¤ो मुą¤ą¤®ें ą¤ ą¤ą¤² स्ऄापन ą¤ą¤°ą¤Øे ą¤े लिठसमर्ऄ नहीं है, तो हे ठर्ą¤ुन! ठą¤्यासरूप योठद्वारा मुą¤ą¤ो प्राप्त होने ą¤े लिą¤ ą¤ą¤्ą¤ा ą¤ą¤°।
यदि तू ą¤ą¤Ŗą¤°्युą¤्त ठą¤्यास में ą¤ी ठसमर्ऄ है, तो ą¤ेवल मेरे लिą¤ ą¤ą¤°्म ą¤ą¤°ą¤Øे ą¤े ही परायण हो ą¤ा। ą¤ą¤ø प्रą¤ार मेरे निमित्त ą¤ą¤°्मों ą¤ो ą¤ą¤°ą¤¤ा हुठą¤ी मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि ą¤ो ही प्राप्त होą¤ा।
यदि मेरी प्राप्ति रूप योठą¤े ą¤ą¤¶्रित होą¤ą¤° ą¤ą¤Ŗą¤°्युą¤्त साधन ą¤ो ą¤ą¤°ą¤Øे में ą¤ी तू ठसमर्ऄ है, तो मन-बुद्धि ą¤ą¤¦ि पर विą¤ą¤Æ प्राप्त ą¤ą¤°ą¤Øे वाला होą¤ą¤° सब ą¤ą¤°्मों ą¤े फल ą¤ा त्याą¤।
मर्म ą¤ो न ą¤ाą¤Øą¤ą¤° ą¤िठहुठठą¤्यास से ą¤्ą¤ान श्रेष्ठहै, ą¤्ą¤ान से मुठपरमेश्वर ą¤े स्वरूप ą¤ा ध्यान श्रेष्ठहै ą¤ą¤° ध्यान से सब ą¤ą¤°्मों ą¤े फल ą¤ा त्याठश्रेष्ठहै, ą¤्योंą¤ि त्याठसे तत्ą¤ाल ही परम शान्ति होती है।
ą¤ो पुरुष सब ą¤ूतों में द्वेष ą¤ाव से रहित, स्वार्ऄ रहित सबą¤ा प्रेमी ą¤ą¤° हेतु रहित दयालु है तऄा ममता से रहित, ठहंą¤ार से रहित, सुą¤-दुःą¤ों ą¤ी प्राप्ति में सम ą¤ą¤° ą¤्षमावान है ठर्ऄात ठपराध ą¤ą¤°ą¤Øे वाले ą¤ो ą¤ी ą¤ ą¤ą¤Æ देने वाला है तऄा ą¤ो योą¤ी निरन्तर संतुष्ठहै, मन-ą¤ą¤Ø्द्रियों सहित शरीर ą¤ो वश में ą¤िठहुठहै ą¤ą¤° मुą¤ą¤®ें दृढ़ निश्ą¤ą¤Æ वाला है- वह मुą¤ą¤®ें ठर्पण ą¤िठहुठमन-बुद्धिवाला मेरा ą¤ą¤्त मुą¤ą¤ो प्रिय है।
ą¤िससे ą¤ोठą¤ी ą¤ीव ą¤ą¤¦्वेठą¤ो प्राप्त नहीं होता ą¤ą¤° ą¤ो स्वयं ą¤ी ą¤िसी ą¤ीव से ą¤ą¤¦्वेठą¤ो प्राप्त नहीं होता तऄा ą¤ो हर्ष, ठमर्ष, ą¤ą¤Æ ą¤ą¤° ą¤ą¤¦्वेą¤ादि से रहित है वह ą¤ą¤्त मुą¤ą¤ो प्रिय है।
ą¤ो पुरुष ą¤ą¤ांą¤्षा से रहित, बाहर-ą¤ीतर से शुद्ध ą¤ą¤¤ुर, पą¤्षपात से रहित ą¤ą¤° दुःą¤ों से ą¤ूą¤ा हुठहै- वह सब ą¤ą¤°ą¤®्ą¤ों ą¤ा त्याą¤ी मेरा ą¤ą¤्त मुą¤ą¤ो प्रिय है।
ą¤ो न ą¤ą¤ी हर्षित होता है, न द्वेष ą¤ą¤°ą¤¤ा है, न शोą¤ ą¤ą¤°ą¤¤ा है, न ą¤ामना ą¤ą¤°ą¤¤ा है तऄा ą¤ो शुą¤ ą¤ą¤° ठशुठसम्पूर्ण ą¤ą¤°्मों ą¤ा त्याą¤ी है- वह ą¤ą¤्तियुą¤्त पुरुष मुą¤ą¤ो प्रिय है।
ą¤ो शत्रु-मित्र में ą¤ą¤° मान-ठपमान में सम है तऄा सर्दी, ą¤ą¤°्मी ą¤ą¤° सुą¤-दुःą¤ादि द्वंद्वों में सम है ą¤ą¤° ą¤ą¤øą¤्ति से रहित है।
ą¤ो निंदा-स्तुति ą¤ो समान ą¤øą¤®ą¤ą¤Øे वाला, मननशील ą¤ą¤° ą¤िस ą¤िसी प्रą¤ार से ą¤ी शरीर ą¤ा निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ठहै ą¤ą¤° रहने ą¤े स्ऄान में ममता ą¤ą¤° ą¤ą¤øą¤्ति से रहित है- वह स्ऄिरबुद्धि ą¤ą¤्तिमान पुरुष मुą¤ą¤ो प्रिय है।
परन्तु ą¤ो श्रद्धायुą¤्त पुरुष मेरे परायण होą¤ą¤° ą¤ą¤ø ą¤ą¤Ŗą¤° ą¤ą¤¹े हुठधर्ममय ठमृत ą¤ो निष्ą¤ाम प्रेमą¤ाव से सेवन ą¤ą¤°ą¤¤े हैं, वे ą¤ą¤्त मुą¤ą¤ो ठतिशय प्रिय हैं।
श्री ą¤ą¤ą¤µान ą¤ोले ą¤ो ą¤ą¤ाą¤्र मन से निरंतर मुą¤े ą¤ą¤ą¤¤ा हैं ते हैं वह ą¤ą¤्ą¤¤ą¤ą¤Ø मेरे लिठश्रेष्ठहै।
ą¤ą¤Ø ą¤ą¤्ą¤¤ą¤ą¤Ø ą¤ो शीą¤्र ही ą¤ą¤ø मृत्यु रूप संसार समुद्र से ą¤ą¤¦्धार ą¤ą¤°ą¤Øे वाला हूं।
ą¤ो व्यą¤्ति मन ą¤ो मुठमें ą¤ ą¤ą¤² स्ऄापना ą¤ą¤°ą¤Øे ą¤े लिठठसमर्ऄ है वह ठą¤्यास रूप योठसे यह प्राप्ति ą¤ą¤° ą¤øą¤ą¤¤ा है।
ą¤ो पुरुष मेरे परायण होą¤ą¤° विश्व धर्ममाय ठमृत ą¤ो निष्ą¤ाम प्रेम ą¤ाव से सेवन ą¤ą¤°ą¤¤े हैं वह ą¤ą¤्त मुą¤ą¤ो ठति प्रिय है।







