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गुरुवार, 7 मार्च 2019

मार्च 07, 2019

Read Bhagwat Geeta In Hindi

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भक्तियोग- अध्याय 12

ą„§-अर्जुन उवाच
ą¤ą¤µं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः।
ą„Ø-श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः।
ą„©-ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्ą¤°ą¤—ą¤®ą¤šिन्त्यं च कूटस्ऄमचलं ध्रुवम्‌।
ą„Ŗ-सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः।
ą„«-क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्‌।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते।
ą„¬-ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।
ą„­-तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्‌।
भवामि नचिरात्पार्ऄ मय्यावेशितचेतसाम्‌।
ą„®-मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।
ą„Æ-अऄ चित्तं समाधातुं न शक्रोषि मयि स्ऄिरम्‌।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं ą¤§ą¤Øą¤ž्जय।
ą„§ą„¦-अभ्यासेऽप्यसमर्ऄोऽसि मत्कर्मपरमो भव।
मदर्ऄमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि।
ą„§ą„§-अऄैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्‌।
ą„§ą„Ø-श्रेयो हि ज्ą¤žानमभ्यासाज्ज्ą¤žानाद्धयानं विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्‌।
ą„§ą„©-अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण ą¤ą¤µ च।
निर्ममो निरहङ्‍कारः समदुःखसुखः क्षमी।
ą„§ą„Ŗ-संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः।
ą„§ą„«-यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः।
ą„§ą„¬-अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यऄः।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः।
ą„§ą„­-यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्‍क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः।
ą„§ą„®-समः शत्रौ च मित्रे च तऄा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्‍गविवर्जितः।
ą„§ą„Æ-तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्‌।
अनिकेतः स्ऄिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः।
ą„Øą„¦-ये तु धर्म्यामृतमिदं यऄोक्तं पर्युपासते।
श्रद्धाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः।

  ą¤…र्जुन बोले- जो भी अनन्य प्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकार से निरन्तर आपके भजन-ध्यान में लगे रहकर आप सगुण रूप परमेश्वर को और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म को ही अतिश्रेष्ठ भाव से भजते हैं- उन दोनों प्रकार के उपासकों में अति उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?
  ą¤¶्री भगवान बोले- मुą¤ą¤®ें जो मन को ą¤ą¤•ाग्र करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुą¤ ą¤œो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुą¤ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुą¤ą¤•ो योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं।
  ą¤Ŗą¤°ą¤Ø्तु जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकऄनीय स्वरूप और सदा ą¤ą¤•ą¤°ą¤ø रहने वाले, नित्य, ą¤…ą¤šą¤², निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरन्तर ą¤ą¤•ीभाव से ध्यान करते हुą¤ भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सबमें समान भाववाले योगी मुą¤ą¤•ो ही प्राप्त होते हैं।
  ą¤‰ą¤Ø सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है।
  ą¤Ŗą¤°ą¤Ø्तु जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुą¤ą¤®ें अर्पण करके मुą¤ सगुणरूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्तियोग से निरन्तर चिन्तन करते हुą¤ भजते हैं।
  ą¤¹े अर्जुन! उन मुą¤ą¤®ें चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार-समुद्र से उद्धार करने वाला होता हूँ।
  ą¤®ुą¤ą¤®ें मन को लगा और मुą¤ą¤®ें ही बुद्धि को लगा, इसके उपरान्त तू मुą¤ą¤®ें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
  ą¤Æą¤¦ि तू मन को मुą¤ą¤®ें ą¤…ą¤šą¤² स्ऄापन करने के लिą¤ समर्ऄ नहीं है, तो हे अर्जुन! अभ्यासरूप योग द्वारा मुą¤ą¤•ो प्राप्त होने के लिą¤ ą¤‡ą¤š्छा कर।
  ą¤Æą¤¦ि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्ऄ है, तो केवल मेरे लिą¤ कर्म करने के ही परायण ą¤¹ो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा।
  ą¤Æą¤¦ि मेरी प्राप्ति रूप योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में भी तू असमर्ऄ है, तो मन-बुद्धि आदि पर विजय प्राप्त करने वाला होकर सब कर्मों के फल का त्याग।
  ą¤®ą¤°्म को न जानकर किą¤ हुą¤ अभ्यास से ज्ą¤žान श्रेष्ठ है, ज्ą¤žान से मुą¤ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग ą¤¶्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति होती है।
  ą¤œो पुरुष सब भूतों में द्वेष भाव से रहित, स्वार्ऄ रहित सबका प्रेमी और हेतु रहित दयालु है तऄा ममता से रहित, अहंकार से रहित, सुख-दुःखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान है अर्ऄात अपराध करने वाले को भी अभय देने वाला है तऄा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है, मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किą¤ हुą¤ है और मुą¤ą¤®ें दृढ़ निश्चय वाला है- वह मुą¤ą¤®ें अर्पण किą¤ हुą¤ मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुą¤ą¤•ो प्रिय है।
  ą¤œिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता तऄा जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगादि से रहित है वह भक्त मुą¤ą¤•ो प्रिय है।
  ą¤œो पुरुष आकांक्षा से रहित, बाहर-भीतर से शुद्ध ą¤šą¤¤ुर, पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है- वह सब आरम्भों का त्यागी मेरा भक्त मुą¤ą¤•ो प्रिय है।
  ą¤œो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तऄा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है- वह भक्तियुक्त पुरुष मुą¤ą¤•ो प्रिय है।
  ą¤œो शत्रु-मित्र में और मान-अपमान में सम है तऄा सर्दी, गर्मी और सुख-दुःखादि द्वंद्वों में सम है और आसक्ति से रहित है।
  ą¤œो निंदा-स्तुति को समान ą¤øą¤®ą¤ą¤Øे वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्ऄान में ममता और आसक्ति से रहित है- वह स्ऄिरबुद्धि भक्तिमान पुरुष मुą¤ą¤•ो प्रिय है।
  ą¤Ŗą¤°ą¤Ø्तु जो श्रद्धायुक्त ą¤Ŗुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुą¤ धर्ममय अमृत को निष्काम प्रेमभाव से सेवन करते हैं, वे भक्त मुą¤ą¤•ो अतिशय प्रिय हैं।

  श्री भगवान भोले जो ą¤ą¤•ाग्र मन से निरंतर मुą¤े भजता हैं ते हैं वह भक्तजन मेरे लिą¤ श्रेष्ठ है।
  इन भक्तजन को शीघ्र ही  इस मृत्यु रूप संसार समुद्र से उद्धार करने वाला हूं।
  जो व्यक्ति मन को मुą¤ में ą¤…ą¤šą¤² स्ऄापना करने के लिą¤ असमर्ऄ है वह अभ्यास रूप योग से यह प्राप्ति कर सकता है।
  जो पुरुष मेरे परायण होकर विश्व धर्ममाय अमृत को निष्काम प्रेम भाव से सेवन करते हैं वह भक्त मुą¤ą¤•ो अति प्रिय है।

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

फ़रवरी 22, 2019

Read Bhagwat Geeta In Hindi

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विराट रूप अध्याय -ą„§ą„§
ą„©ą„«-ą¤ą¤¤ą¤š्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृतांजलिर्वेपमानः किरीटी।
नमस्कृत्वा भूय ą¤ą¤µाह कृष्णंसगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य।
ą„©ą„¬-स्ऄाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या ą¤œą¤—ą¤¤्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्‍घा:।
ą„©ą„­-कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्‌ गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।
अनन्त देवेश ą¤œą¤—ą¤Ø्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्‌।
ą„©ą„®-त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप।
ą„©ą„Æ-वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्‍क: प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते।
ą„Ŗą„¦-नमः पुरस्तादऄ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत ą¤ą¤µ सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वंसर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः।
ą„Ŗą„§-सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
ą¤…ą¤œानता महिमानं तवेदंमया प्रमादात्प्रणयेन वापि।
ą„Ŗą„Ø-यच्चावहासार्ऄमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु।
ą¤ą¤•ोऽऄवाप्यच्युत तत्समक्षंतत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्‌।
ą„Ŗą„©-पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्‌।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्योलोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव।
ą„Ŗą„Ŗ-तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायंप्रसादये त्वामहमीशमीऔ्यम्‌।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्‌।
ą„Ŗą„«-अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यऄितं मनो मे।
तदेव मे दर्शय देवरूपंप्रसीद देवेश ą¤œą¤—ą¤Ø्निवास।
ą„Ŗą„¬-किरीटिनं गदिनं ą¤šą¤•्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तऄैव।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेनसहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते।
ą„Ŗą„­-मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदंरूपं परं दर्शितमात्मयोगात्‌।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यंयन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्‌।
ą„Ŗą„®-न वेदयज्ą¤žाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः।
ą¤ą¤µं रूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर।
ą„Ŗą„Æ-मा ते व्यऄा मा च विमूढभावोदृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्‍ममेदम्‌।
व्यतेपभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वंतदेव मे रूपमिदं प्रपश्य।
ą„«ą„¦-इत्यर्जुनं वासुदेवस्तऄोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः।
आश्वासयामास च भीतमेनंभूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा।
ą„«ą„§-दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः।
ą„«ą„Ø-सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्‍क्षिणः।
ą„«ą„©-नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।
शक्य ą¤ą¤µं विधो द्रष्टुं दृष्ट्वानसि मां यऄा।
ą„«ą„Ŗ-भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ą¤žातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप।
ą„«ą„«-मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्‍गवर्जितः।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्औव।

  ą¤øंजय बोले- भगवान के इस वचन को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाऄ जोऔ़कर काँपते हुą¤ नमस्कार करके, फिर भी अत्यन्त भयभीत होकर प्रणाम करके भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गद्‍गद्‍ वाणी से बोले।
  ą¤…र्जुन बोले- हे अन्तर्यामिन्! यह योग्य ही है कि आपके नाम, गुण और प्रभाव के कीर्तन से ą¤œą¤—ą¤¤ अति हर्षित हो रहा है और अनुराग को भी प्राप्त हो रहा है तऄा भयभीत राक्षस लोग दिशाओं में भाग रहे हैं और सब सिद्धगणों के समुदाय नमस्कार कर रहे हैं।
  ą¤¹े महात्मन्‌! ब्रह्मा के भी आदिकर्ता और सबसे बऔ़े आपके लिą¤ वे कैसे नमस्कार न करें क्योंकि हे अनन्त! हे देवेश! हे ą¤œą¤—ą¤Ø्निवास! जो सत्‌, असत्‌ और उनसे परे अक्षर अर्ऄात सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है, वह आप ही हैं।
  ą¤†ą¤Ŗ आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इन ą¤œą¤—ą¤¤ के परम आश्रय और जानने वाले तऄा जानने योग्य और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप! आपसे यह सब ą¤œą¤—ą¤¤ व्याप्त अर्ऄात परिपूर्ण हैं।
  ą¤†ą¤Ŗ वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के भी पिता हैं। आपके लिą¤ हजारों बार नमस्कार! नमस्कार हो!! आपके लिą¤ फिर भी बार-बार नमस्कार! नमस्कार!
  ą¤¹े अनन्त सामर्ऄ्यवाले! आपके लिą¤ आगे से और पीछे से भी नमस्कार! हे सर्वात्मन्‌! आपके लिą¤ सब ओर से ही नमस्कार हो, क्योंकि अनन्त पराक्रमशाली आप समस्त संसार को व्याप्त किą¤ हुą¤ हैं, इससे आप ही सर्वरूप हैं।
  ą¤†ą¤Ŗą¤•े इस प्रभाव को न जानते हुą¤, आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर प्रेम से अऄवा प्रमाद से भी मैंने 'हे कृष्ण!', 'हे यादव !' 'हे सखे!' इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-ą¤øą¤®ą¤े हठात्‌ कहा है और हे ą¤…ą¤š्युत! आप जो मेरे द्वारा विनोद के लिą¤ विहार, शय्या, आसन और भोजनादि में अकेले अऄवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किą¤ ą¤—ą¤ हैं- वह सब अपराध अप्रमेयस्वरूप अर्ऄात ą¤…ą¤šिन्त्य प्रभाव वाले आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ।
  ą¤†ą¤Ŗ इस चराचर ą¤œą¤—ą¤¤ के पिता और सबसे बऔ़े गुरु ą¤ą¤µं अति पूजनीय हैं। हे अनुपम प्रभाववाले! तीनों लोकों में आपके समान भी दूसरा कोई नहीं हैं, फिर अधिक तो कैसे हो सकता है।
  ą¤…ą¤¤ą¤ą¤µ हे प्रभो! मैं शरीर को भलीभाँति चरणों में निवेदित कर, प्रणाम करके, स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिą¤ प्रार्ऄना करता हूँ। हे देव! पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रियतमा पत्नी के अपराध सहन करते हैं- वैसे ही आप भी मेरे अपराध को सहन करने योग्य हैं।।
  ą¤®ैं पहले न देखे हुą¤ आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है, इसलिą¤ आप उस अपने चतुर्भुज विष्णु रूप को ही मुą¤े दिखलाą¤‡ą¤। हे देवेश! हे ą¤œą¤—ą¤Ø्निवास! प्रसन्न होą¤‡ą¤।
  ą¤®ैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किą¤ हुą¤ तऄा गदा और ą¤šą¤•्र हाऄ में लिą¤ हुą¤ देखना चाहता हूँ। इसलिą¤ हे विश्वस्वरूप! हे सहस्रबाहो! आप उसी चतुर्भुज रूप से प्ą¤°ą¤•ą¤Ÿ होą¤‡ą¤।
  ą¤¶्री भगवान बोले- हे अर्जुन! अनुग्रहपूर्वक मैंने अपनी योगशक्ति के प्रभाव से यह मेरे परम तेजोमय, सबका आदि और सीमारहित विराट् रूप तुą¤ą¤•ो दिखाया है, जिसे तेरे अतिरिक्त दूसरे किसी ने पहले नहीं देखा ऄा।
  ą¤¹े अर्जुन! मनुष्य लोक में इस प्रकार विश्व रूप वाला मैं न वेद और यज्ą¤žों के अध्ययन से, न दान से, न क्रियाओं से और न उग्र तपों से ही तेरे अतिरिक्त दूसरे द्वारा देखा जा सकता हूँ।
  ą¤®ेरे इस प्रकार के इस विकराल रूप को देखकर तुą¤ą¤•ो व्याकुलता नहीं होनी चाहिą¤ और मूढ़भाव भी नहीं होना चाहिą¤। तू भयरहित और प्रीतियुक्त मनवाला होकर उसी मेरे इस शंख-ą¤šą¤•्र-गदा-पद्मयुक्त चतुर्भुज रूप को फिर देख।
  ą¤øंजय बोले- वासुदेव भगवान ने अर्जुन के प्रति इस प्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुज रूप को दिखाया और फिर महात्मा श्रीकृष्ण ने सौम्यमूर्ति होकर इस भयभीत अर्जुन को धीरज दिया।
  ą¤…र्जुन बोले- हे जनार्दन! आपके इस अतिशांत मनुष्य रूप को देखकर अब मैं स्ऄिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्ऄिति को प्राप्त हो गया हूँ।
  ą¤¶्री भगवान बोले- मेरा जो चतुर्भज रूप तुमने देखा है, वह सुदुर्दर्श है अर्ऄात्‌ इसके दर्शन बऔ़े ही दुर्लभ हैं। देवता भी सदा इस रूप के दर्शन की आकांक्षा करते रहते हैं।
  ą¤œिस प्रकार तुमने मुą¤ą¤•ो देखा है- इस प्रकार चतुर्भुज रूप वाला मैं न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ą¤ž से ही देखा जा सकता हूँ।
  ą¤Ŗą¤°ą¤Ø्तु हे परंतप अर्जुन! अनन्य भक्ति (अनन्यभक्ति का भाव अगले श्लोक में विस्तारपूर्वक कहा है।) के द्वारा इस प्रकार चतुर्भुज रूपवाला मैं प्रत्यक्ष देखने के लिą¤, तत्व से जानने के लिą¤ तऄा प्रवेश करने के लिą¤ अर्ऄात ą¤ą¤•ीभाव से प्राप्त होने के लिą¤ भी शक्य हूँ।
  ą¤¹े अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिą¤ सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव से रहित है वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष मुą¤ą¤•ो ही प्राप्त होता है।


भगवान के विश्वरूप को देख कर अर्जुन कहने लगा जो सत असत और इससे परे अक्षर अर्ऄात सचिदानंदधन ब्रह्म है वह आप ही है।
आप ही इस चराचर ą¤œą¤—ą¤¤ के पीता है और सबसे बऔ़ा गुरु आप ही हैं। इस संसार को चलाने वाले आप ही है। इस तरह श्री भगवान के विश्वरूप को देख कर अर्जुन प्रशंसा करने लगा।
श्री भगवान बोले, हे अर्जुन जिस रूप को तुमने देखा, इसके दर्शन बऔ़े ही दुर्लभ है। देवता भी हमेशा इस रूप को देखने की ą¤‡ą¤š्छा रखते हैं। जिस रूप को तुमने देखा इस रूप को ना तप से, ना यज्ą¤ž से, ना दान से भी देखा जा सकता है।
परंतु अनन्य भक्ति के द्वारा इस चतुर्भुज रूप को प्रत्यक्षा से देखा जा सकता है।
जो भक्त अनन्य भक्ति के साऄ और हर ą¤ą¤• कर्तव्य भगवान के लिą¤ ही करता है वह ही भगवान को प्राप्त कर सकता है। मन में भक्ति और निष्ठा भाव से जो भगवान के ध्यान में लगा रहता है वही भगवान को प्राप्त कर सकता है।

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2019

फ़रवरी 15, 2019

Read Bhagwat Geeta In Hindi

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विराट रूप अध्याय -ą„§ą„§ 
ą„§ą„Æ-अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्‌।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रंस्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्‌
ą„Øą„¦-द्यावापृऄिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदंलोकत्रयं प्रव्यऄितं महात्मन्‌।
ą„Øą„§-अमी हि त्वां सुरसङ्‍घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राą¤ž्जलयो गृणन्ति।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्‍घा: स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः।
ą„Øą„Ø-रुद्रादित्या वसवो ये च साध्याविश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च।
गंधर्वयक्षासुरसिद्धसङ्‍घावीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे।
ą„Øą„©-रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रंमहाबाहो बहुबाहूरूपादम्‌।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालंदृष्टवा लोकाः प्रव्यऄितास्तऄाहम्‌।
ą„Øą„Ŗ-नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णंव्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्‌।
दृष्टवा हि त्वां प्रव्यऄितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।
ą„Øą„«-दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानिदृष्टैव कालानलसन्निभानि।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश ą¤œą¤—ą¤Ø्निवास।
ą„Øą„¬-अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तऄासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः।
ą„Øą„­-वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्‍गै।
ą„Øą„®-यऄा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति।
तऄा तवामी नरलोकवीराविशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति।
ą„Øą„Æ-यऄा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगाविशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।
तऄैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः।
ą„©ą„¦-लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः।
तेजोभिरापूर्य ą¤œą¤—ą¤¤्समग्रंभासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो।
ą„©ą„§-आख्याहि मे को भवानुग्ररूपोनमोऽस्तु ते देववर प्रसीद।
विज्ą¤žातुमिच्छामि भवन्तमाद्यंन हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्‌।
ą„©ą„Ø-श्रीभगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्ऄिताः प्रत्यनीकेषु योधाः।
ą„©ą„©-तस्मात्त्वमुक्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्‍क्ष्व राज्यं समृद्धम्‌।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्‌।
ą„©ą„Ŗ- द्रोणं च भीष्मं च जयद्रऄं च कर्णं तऄान्यानपि योधवीरान्‌।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यऄिष्ठायुध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्‌।

  ą¤†ą¤Ŗą¤•ो तो आदि, अंत और मध्य से रहित, अनन्त सामर्ऄ्य से युक्त, अनन्त भुजावाले, चन्द्र-सूर्य रूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्निरूप मुखवाले और अपने तेज से इस ą¤œą¤—ą¤¤ को संतृप्त करते हुą¤ देखता हूँ।
  ą¤¹े महात्मन्‌! यह पृऄ्वी ओर स्वर्ग के बीच का जो सम्पूर्ण आकाश तऄा सब दिशाą¤ँ ą¤ą¤• आपसे ही परिपूर्ण हैं तऄा आपके इस अलौकिक और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अतिव्यऄा को प्राप्त हो रहे हैं।
   ą¤†ą¤Ŗ में तो देवी देवताओं के संपूर्ण समूह प्रवेश करते हैं और कुछ भयभीत होकर हाऄ जोऔ़े आपके नाम और गुणों का ą¤‰ą¤š्चारण करते हैं तऄा महर्षि और सिद्धों सभी उत्तम-उत्तम स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते है।
  ą¤ą¤•ादश रुद्र ओर द्वादश आदित्य, आठ वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार तऄा मरुद्गण और पितरों का समुदाय तऄा गंधर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय हैं- वे सब ही विस्मित होकर आपको देखते हैं।
  ą¤¹े महाबाहो! आपके बहुत चेहरे और नयनों वाले, बहुत हाऄ, जंघा और पैरों वाले, बहुत उदरों वाले और बहुत-सी दाढ़ों के कारण अत्यन्त विकराल महान रूप को देखकर सब लोग व्याकुल होते हैं और मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ।
  ą¤•्योंकि हे विष्णो! गगन को छूने वाले, दैदीप्यमान, अनेक वर्णों से युक्त तऄा फैलाą¤ हुą¤ मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरण वाला मैं धीरज और शान्ति नहीं पाता हूँ।
  ą¤¦ाढ़ों के कारण विकराल और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित आपके मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जानता हूँ और सुख भी नहीं पाता हूँ। इसलिą¤ हे देवेश! हे ą¤œą¤—ą¤Ø्निवास! आप प्रसन्न हों।
  ą¤µे समस्त धृतराष्ट्र के संतानों राजाओं के समुदाय सहित आप में प्रवेश कर रहे हैं और भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तऄा वह कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धाओं के सहित सबके सब आपके दाढ़ों के कारण विकराल भयानक मुखों में बऔ़े वेग से दौऔ़ते हुą¤ प्रवेश कर रहे हैं और ą¤•ą¤ˆ ą¤ą¤• चूर्ण हुą¤ सिरों सहित आपके दाँतों के बीच में लगे हुą¤ दिख रहे हैं।
  ą¤œैसे नदियों के बहुत-से जल के प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्र के ही सम्मुख दौऔ़ते हैं अर्ऄात समुद्र में प्रवेश करते हैं, वैसे ही वे नरलोक के वीर भी आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।
  ą¤œैसे पतंग मोहवश नष्ट होने के लिą¤ प्रज्वलित अग्नि में अतिवेग से दौऔ़ते हुą¤ प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिą¤ आपके मुखों में अतिवेग से दौऔ़ते हुą¤ प्रवेश कर रहे हैं।
  ą¤†ą¤Ŗ उन सम्पूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रास करते हुą¤ सब ओर से बार-बार चाट रहे हैं। हे विष्णो! आपका उग्र प्रकाश सम्पूर्ण ą¤œą¤—ą¤¤ को तेज द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है।
  ą¤®ुą¤े बतलाą¤‡ą¤ कि आप उग्ररूप वाले कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो। आप प्रसन्न होą¤‡ą¤। आदि पुरुष आपको मैं विशेष रूप से जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता।
  ą¤¶्री भगवान बोले- मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिą¤ प्रवृत्त हुआ हूँ। इसलिą¤ जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्ऄित योद्धा लोग हैं, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्ऄात तेरे युद्ध न करने पर भी इन सबका नाश हो जाą¤ą¤—ा।
  ą¤…ą¤¤ą¤ą¤µ तू उठ! यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोग। ये सब शूरवीर पहले ही से मेरे ही द्वारा मारे हुą¤ हैं। हे सव्यसाचिन! ą¤¤ू तो केवल निमित्तमात्र बन जा।
  ą¤¦्रोणाचार्य और भीष्म पितामह तऄा जयद्रऄ और कर्ण तऄा और भी बहुत से मेरे द्वारा मारे हुą¤ शूरवीर योद्धाओं को तू मार। भय मत कर। निःसंदेह तू युद्ध में वैरियों को जीतेगा। इसलिą¤ युद्ध कर।

अब तक तो अर्जुन यह सोचता ऄा कि वह लऔ़ेगा और कौरव का वध करेगा। लेकिन जब वह भगवान विष्णु के विश्वरूप को देखा तो वह ą¤øą¤®ą¤ गया के उसे तो सिर्फ कर्तव्य ही करना है। जिन लोगों को वह मारने के लिą¤ सोच रहा ऄा वह तो पहले से ही मरे हुą¤ हैं। अर्जुन ą¤…ą¤š्छी तरह ą¤øą¤®ą¤ गया ऄा कि हम तो सिर्फ कर्तव्य ही करते हैं, जो कुछ होता है या जो कुछ होने वाला है या जो कुछ हो चुका है वह तो सिर्फ भगवान ही करते हैं।
   ą¤œो लोग यह सोचते हैं के मैं यह करता हूं, मैं उसे मारता हूं, मैं उसे बचाता हूं, वह मूर्ख होते हैं। क्योंकि यह सब तो सिर्फ भगवान ही करते हैं हम तो निमित्त मात्र सिर्फ अपना कर्तव्य करते रहते हैं और करते जाना है।

रविवार, 10 फ़रवरी 2019

फ़रवरी 10, 2019

Srimad Bhagwat Geeta

Srimad Bhagwat Geeta

Srimad Bhagwat Geeta
Srimad Bhagwat Geeta

विराट रूप अध्याय -ą„§ą„§ 
ą„§-मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्ą¤®ą¤øą¤ž्ज्ą¤žितम्‌।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम।
ą„Ø-भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया।
त्वतः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्‌।
ą„©-ą¤ą¤µą¤®ेतद्यऄात्ऄ त्वमात्मानं परमेश्वर।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम।
ą„Ŗ-मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्‌।
ą„«-पश्य मे पार्ऄ रूपाणि शतशोऽऄ सहस्रशः।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च।
ą„¬-पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तऄा।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत।
ą„­-इहैकस्ऄं ą¤œą¤—ą¤¤्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्‌।
मम देहे गुऔाकेश यच्चान्यद्द्रष्टमिच्छसि।
ą„®-न तु मां शक्यसे द्रष्टमनेनैव स्ą¤µą¤šą¤•्षुषा।
दिव्यं ददामि ते ą¤šą¤•्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्‌।
ą„Æ-ą¤ą¤µą¤®ुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः।
दर्शयामास पार्ऄाय परमं रूपमैश्वरम्‌।
ą„§ą„¦-अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्‌।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्‌।
ą„§ą„§-दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्‌।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्‌।
ą„§ą„Ø-दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्ऄिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः।
ą„§ą„©-तत्रैकस्ऄं ą¤œą¤—ą¤¤्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्औवस्तदा।
ą„§ą„Ŗ-ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा ą¤§ą¤Øą¤ž्जयः।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताą¤ž्जलिरभाषत।
ą„§ą„«-पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तऄा भूतविशेषसङ्‍घान्‌।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्ऄमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्‌।
ą„§ą„¬-अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रंपश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्‌।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिंपश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप।
ą„§ą„­-किरीटिनं गदिनं ą¤šą¤•्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्‌।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्‌।
ą„§ą„®-त्वमक्षरं परमं वेदितव्यंत्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे।

  ą¤…र्जुन ने कहा, मुą¤ पर अनुग्रह करने केलिą¤ जो भी  परम गोपनीय अध्यात्म विषयक वचन और उपदेश आपने कहा, उससे मेरा यह ą¤…ą¤œ्ą¤žान नष्ट हो गया है।
  ą¤•्योंकि हे कमलनेत्र! आपसे तो भूतों की उत्पत्ति और प्रलय विस्तारपूर्वक सुने हैं तऄा आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है।
  ą¤¹े परमेश्वर! अपने आप को आप जैसा कहते हैं, यह ठीक ऐसा ही है, परन्तु हे पुरुषोत्तम! आपके ज्ą¤žान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ऐश्वर्य-रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।
  मेरे द्वारा अगर आपका वह रूप देखा जाना शक्य है- ऐसा आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर! उस अविनाशी स्वरूप का मुą¤ą¤•ो दर्शन कराą¤‡ą¤।
  ą¤¶्री भगवान बोले- हे पार्ऄ! अब तूम मेरे सैकऔ़ों-हजारों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तऄा नाना आकृतिवाले अलौकिक रूपों को देखो।
  ą¤¹े भरतवंशी अर्जुन! तु मुą¤ą¤®ें आदित्यों को अर्ऄात अदिति के द्वादश पुत्रों को, आठ वसुओं को, ą¤ą¤•ादश रुद्रों को, दोनों अश्विनीकुमारों को और ą¤‰ą¤Øą¤šास मरुद्गणों को देख तऄा और भी बहुत से पहले न देखे हुą¤ आश्चर्यमय रूपों को देख।
  ą¤¹े अर्जुन! अब इस मेरे शरीर में ą¤ą¤• ą¤œą¤—ą¤¹ स्ऄित चराचर सहित सम्पूर्ण ą¤œą¤—ą¤¤ को देख तऄा और भी जो कुछ देखना चाहता हो सो देख।
  ą¤Ŗą¤°ą¤Ø्तु मुą¤ą¤•ो तू अपने इन प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने में निःसंदेह समर्ऄ नहीं है, इसी से मैं तुą¤े दिव्य अर्ऄात अलौकिक ą¤šą¤•्षु देता हूँ, इससे तू मेरी ईश्वरीय योग शक्ति को देख।
  ą¤øंजय बोले- हे राजन्‌! सब पापों के नाश करने वाले भगवान और ą¤®ą¤¹ायोगेश्वर ने इस प्रकार कहकर उसके पश्चात अर्जुन को परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्यस्वरूप दिखलाया।
  ą¤…नेक नेत्रों और अनेक मुख से युक्त, अनेकों अद्भुत दर्शनों वाले, बहुत से दिव्य भूषणों से युक्त और बहुत से दिव्य शस्त्रों को धारण किą¤ हुą¤ और दिव्य गंध का सारे शरीर में लेप किą¤ हुą¤, सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त, सीमारहित और सब ओर मुख किą¤ हुą¤ विराट्स्वरूप परमदेव परमेश्वर को अर्जुन ने देखा।
  ą¤†ą¤•ाश में जैसे हजार सूर्यों के ą¤ą¤• साऄ उदय होने से उत्पन्न जो प्रकाश हो, वह भी उस विश्व रूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित्‌ ही हो।
  अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त अर्ऄात पृऄक-पृऄक सम्पूर्ण ą¤œą¤—ą¤¤ को देवों के देव श्रीकृष्ण भगवान के उस शरीर में ą¤ą¤• ą¤œą¤—ą¤¹ स्ऄित देखा।
  ą¤‰ą¤øą¤•े अनंतर आश्चर्य से ą¤šą¤•ित और पुलकित शरीर अर्जुन प्रकाशमय विश्वरूप परमात्मा को श्रद्धा-भक्ति सहित सिर से प्रणाम करके हाऄ जोऔ़कर बोले।
  ą¤…र्जुन बोले- हे देव! आपके शरीर में मैं सम्पूर्ण देवों को तऄा अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर विराजित ब्रह्मा को, महादेव को और सम्पूर्ण ऋषियों को तऄा दिव्य सर्पों को देखता हूँ।
  ą¤¹े सम्पूर्ण विश्व के स्वामि! आपको अनेक भुजा, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तऄा सब ओर से अनन्त रूपों वाला देखता हूँ। हे विश्वरूप! मैं आपके न अन्त को देखता हूँ, न मध्य को और न आदि को ही।
  ą¤†ą¤Ŗą¤•ो मैं मुकुटयुक्त, गदायुक्त और ą¤šą¤•्रयुक्त तऄा सब ओर से प्रकाशमान तेज के पुंज, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश ज्योतियुक्त, कठिनता से देखे जाने योग्य और सब ओर से अप्रमेयस्वरूप देखता हूँ।
  ą¤†ą¤Ŗ जानने योग्य परम अक्षर अर्ऄात परब्रह्म परमात्मा हैं। आप ही इस ą¤œą¤—ą¤¤ के परम आश्रय हैं, आप ही अनादि धर्म के रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं। ऐसा मेरा मत है।

 ą¤Ŗिछले अध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने अपनी बिभूतिओ के बारे में संक्षेप में बर्णन किये। जिसे सुनकर अर्जुन संतुस्ट हो गया, सुनकर अर्जुन को प्रेरणा भी मिली। अर्जुन ने कहा आप ने मुą¤ą¤Ŗą¤° अनुग्रह करने केलिą¤ जो भी परम गोपनीय वचन और उपदेस कहा उसे सुनकर मेरा ą¤…ą¤œ्ą¤žान नस्ट होगया लेकिन मैं इसे प्रत्येख में देखना चाहता हूँ। क्योंकि देखने और सुन ने में पूर्व और पश्चिम का अंतर है। 
  भगवान ने कहा मेरे उस रूप को देखने केलिą¤ दिव्यद्रुस्टि आवश्यक है।  जो मैं तुह्मे प्रदान करता हूँ। अब तू देख। 
  अर्जुन जब उस विराट रूप को देखा तो भयभीत होने लगा।  अर्जुन जैसे महारऄी भी कांपने लगा तो हम और आप क्या है। 
 ą¤…र्जुन ने कहा आप ही परब्रह्म परमात्मा है, आप ही अविनाशी और सनातन पुरुष है।

बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

फ़रवरी 06, 2019

Read Bhagwat Geeta In Hindi

Read Bhagwat Geeta In Hindi

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श्री भगवान का ऐश्वर्य

हरि ą„ तत्सत ą„©ą„§-ą„Ŗą„Ø(अध्याय -ą„§ą„¦)

ą„©ą„§-पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्‌।

ą¤ą¤·ाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी।
ą„©ą„Ø-सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्‌।
ą„©ą„©-अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः।
ą„©ą„Ŗ-मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्‌।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा।
ą„©ą„«-बृहत्साम तऄा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्‌।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः।
ą„©ą„¬-द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्‌।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्‌।
ą„©ą„­-वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्औवानां ą¤§ą¤Øą¤ž्जयः।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः।
ą„©ą„®-दण्औो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्‌।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ą¤žानं ज्ą¤žानवतामहम्‌।
ą„©ą„Æ-यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्‌।
ą„Ŗą„¦-नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप।
ą¤ą¤· तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया।
ą„Ŗą„§-यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवाą¤µą¤—ą¤š्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्‌।
ą„Ŗą„Ø-अऄवा बहुनैतेन किं ज्ą¤žातेन तवार्जुन।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्ऄितो ą¤œą¤—ą¤¤्‌।

  ą¤®ैं ही पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ तऄा मछलियों में मगर हूँ और नदियों में श्री भागीरऄी गंगाजी हूँ।
  ą¤¹े अर्जुन! सृष्टियों के आदि, अंत तऄा मध्य भी मैं ही हूँ। मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या अर्ऄात्‌ ब्रह्मविद्या और परस्पर विवाद करने वालों का तत्व-निर्णय के लिą¤ किया जाने वाला वाद हूँ।
  ą¤®ैं ही अक्षरों में अकार हूँ और समासों में द्वंद्व नामक समास हूँ। अक्षयकाल अर्ऄात्‌ काल का भी महाकाल तऄा सब ओर मुखवाला, विराट्स्वरूप, सबका धारण-पोषण करने वाला भी मैं ही हूँ।
मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ तऄा स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक्‌, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।
  मैं ही गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम और छंदों में गायत्री छंद हूँ तऄा महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसंत मैं हूँ।
  ą¤®ैं छल करने वालों में जूआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ। मैं जीतने वालों का विजय हूँ, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्त्विक पुरुषों का सात्त्विक भाव हूँ।
  ą¤µृष्णिवंशियों में ą¤µासुदेव अर्ऄात्‌ मैं स्वयं तेरा सखा, पाण्औवों में ą¤§ą¤Øą¤ž्जय अर्ऄात्‌ तू, मुनियों में वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूँ।
  ą¤®ैं ही दमन करने वालों का दंऔ अर्ऄात्‌ दमन करने की शक्ति हूँ, जीतने की ą¤‡ą¤š्छावालों की नीति हूँ, गुप्त रखने योग्य भावों का रक्षक मौन हूँ और ज्ą¤žानवानों का तत्त्वज्ą¤žान मैं ही हूँ।
  ą¤”र हे अर्जुन! जो सब भूतों की उत्पत्ति का कारण है, वह भी मैं ही हूँ, क्योंकि ऐसा चर और ą¤…ą¤šą¤° कोई भी भूत नहीं है, जो मुą¤ą¤øे रहित हो।
  ą¤¹े परंतप! मेरी दिव्य-विभूतियों का भी अंत नहीं है, मैंने अपनी विभूतियों का यह विस्तार तो तेरे लिą¤ ą¤ą¤•ą¤¦ेश से अर्ऄात्‌ संक्षेप से कहा है।
  ą¤œो-जो भी विभूतियुक्त अर्ऄात्‌ ऐश्वर्ययुक्त, कांतियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उस को तू मेरे तेज के अंश की ही अभिव्यक्ति जान।
  ą¤…ऄवा हे अर्जुन! इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रायोजन है। मैं इस संपूर्ण ą¤œą¤—ą¤¤्‌ को अपनी योगशक्ति के ą¤ą¤• अंश मात्र से धारण करके स्ऄित हूँ।

  यह संपूर्ण ą¤œą¤—ą¤¤ को श्री भगवान अपनी योग शक्ति के ą¤ą¤• अंश मात्र से धारण करते हैं।
  भगवान विष्णु के बारे में जानने के लिą¤ और क्या शेष रह जाता है। जब संपूर्ण ą¤œą¤—ą¤¤, भगवान के ą¤ą¤• अंश मात्र है तो फिर ą¤ą¤• साधारण मनुष्य का मूल्य ą¤•्या है। फिर भी इंसान कभी कभी अपने अहंकार से मोहित होकर भगवान को भूल जाने की भूल कर बैठता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिą¤ की यह ą¤œą¤—ą¤¹ जो भगवान के ą¤ą¤• अंश है, उसके ą¤ą¤• साधारण अंस हम हैं। इसलिą¤ हर वक्त हर पल भगवान के ध्यान में ही लगा रहना चाहिą¤।

सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

फ़रवरी 04, 2019

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श्री भगवान का ऐश्वर्य

हरि ą„ तत्सत ą„§ą„¬-ą„©ą„¦(अध्याय -ą„§ą„¦)

ą„§ą„¬-वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि।
ą„§ą„­-कऄं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्‌।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया।
ą„§ą„®-विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन।
भूयः कऄय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्‌।
ą„§ą„Æ-हन्त ते कऄयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे।
ą„Øą„¦-अहमात्मा गुऔाकेश सर्वभूताशयस्ऄितः।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त ą¤ą¤µ च।
ą„Øą„§-आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्‌।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी।
ą„Øą„Ø-वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना।
ą„Øą„©-रुद्राणां शङ्‍करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्‌।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्‌।
ą„Øą„Ŗ-पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्ऄ बृहस्पतिम्‌।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः।
ą„Øą„«-महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्‌।
यज्ą¤žानां जपयज्ą¤žोऽस्मि स्ऄावराणां हिमालयः।
ą„Øą„¬-अश्वत्ऄः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः।
गन्धर्वाणां चित्ररऄः सिद्धानां कपिलो मुनिः।
ą„Øą„­-ą¤‰ą¤š्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्धवम्‌।
ą¤ą¤°ावतं ą¤—ą¤œेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्‌।
ą„Øą„®-आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्‌।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः।
ą„Øą„Æ-अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्‌।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्‌।
ą„©ą„¦-प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्‌।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्‌।

  ą¤‡ą¤øą¤²िą¤ आप उन अपनी दिव्य विभूतियों को संपूर्णता से कहने में समर्ऄ हैं, जिन विभूतियों द्वारा आप इन सब लोकों को व्याप्त करके स्ऄित हैं।
  ą¤¹े योगेश्वर! मैं किस प्रकार से निरंतर चिंतन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवन्‌! आप किस-किस भावों में मेरे द्वारा चिंतन करने योग्य हैं?
  ą¤¹े जनार्दन! अपनी ही योगशक्ति को और विभूति को फिर भी विस्तारपूर्वक कहिą¤, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुą¤ मेरी तृप्ति नहीं होती अर्ऄात्‌ सुनने की उत्कंठा बनी ही रहती है।
  ą¤¶्री भगवान बोले- हे कुरुश्रेष्ठ! अभी मैं जो मेरी दिव्य विभूतियाँ हैं, उनको तेरे लिą¤ प्रधानता से कहूँगा; क्योंकि मेरे विस्तार का अंत नहीं है।
  ą¤¹े अर्जुन! मैं सभी भूतों के हृदय में स्ऄित सबका आत्मा हूँ तऄा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ।
  ą¤®ैं ही अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु और ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूँ तऄा मैं ą¤‰ą¤Øą¤šास वायुदेवताओं का तेज और नक्षत्रों का अधिपति चंद्रमा हूँ।
  ą¤®ैं ही वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और भूत प्राणियों की चेतना अर्ऄात्‌ जीवन-शक्ति हूँ।
  ą¤®ैं ही ą¤ą¤•ादश रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तऄा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ। मैं आठ वसुओं में अग्नि हूँ और शिखरवाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ।
  ą¤Ŗुरोहितों में मुखिया बृहस्पति मुą¤ą¤•ो जान। हे पार्ऄ! मैं ही सेनापतियों में स्कंद और जलाशयों में समुद्र हूँ।
  ą¤®ैं ही महर्षियों में भृगु और शब्दों में ą¤ą¤• अक्षर अर्ऄात्‌‌ ओंकार हूँ। सब प्रकार के यज्ą¤žों में जपयज्ą¤ž और स्ऄिर रहने वालों में हिमालय पहाऔ़ हूँ।
  ą¤®ैं सभी वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देवर्षियों में नारद मुनि, गन्धर्वों में चित्ररऄ और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ।
  सभी घोऔ़ों में अमृत के साऄ उत्पन्न होने वाला ą¤‰ą¤š्चैःश्रवा नामक घोऔ़ा, श्रेष्ठ हाऄियों में ऐरावत नामक हाऄी और मनुष्यों में राजा मुą¤ą¤•ो जान।
  ą¤®ैं ही में वज्र और गौओं में कामधेनु हूँ। शास्त्रोक्त रीति से सन्तान की उत्पत्ति का हेतु कामदेव हूँ और सर्पों में सर्पराज वासुकि हूँ।
  ą¤®ैं नागों में ą¤¶ेषनाग और जलचरों का अधिपति वरुण देवता हूँ और पितरों में अर्यमा नामक पितर तऄा शासन करने वालों में यमराज मैं हूँ।
  ą¤®ैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों का समय ą¤¹ूँ तऄा पशुओं में मृगराज सिंह और पक्षियों में गरुऔ़ हूँ।


 ą¤­ą¤—वान के दिव्य विभूतियों को विस्तार से जान पाना मुश्किल है। क्योंकि उनका कोई अंत नहीं है।
   ą¤øंसार में जो भी श्रेष्ठ है उसमें भगवान है। संसार जहां से शुरुआत है वहां भगवान है। संसार के अंत और मध्य में भी भगवान ही है। जहां तक हम सोच पाते हैं वहां तक भगवान है। जहां तक हम देख पाते हैं वहां तक भगवान है। जहां तक हम ą¤øą¤®ą¤ पाते हैं वहां तक भगवान है। शुरू से अंत तक सिर्फ भगवान ही है।
  भगवान को पाने के लिą¤ हमें कहीं जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि जहां भी हम देखते हैं, जहां हम सोचते हैं वहां भगवान मौजूद है बस उनको अंतरात्मा से ध्यान करने की जरूरत है।

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

फ़रवरी 01, 2019

Read Bhagwat Geeta In Hindi

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श्री भगवान का ऐश्वर्य

हरि ą„ तत्सत ą„§-ą„§ą„«(अध्याय -ą„§ą„¦)

ą„§-भूय ą¤ą¤µ महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया।
ą„Ø-न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः।
ą„©-यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्‌।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते।
ą„Ŗ-बुद्धिर्ज्ą¤žानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च।
ą„«-अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त ą¤ą¤µ पृऄग्विधाः।
ą„¬-महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तऄा।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः।
ą„­-ą¤ą¤¤ां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः।
ą„®-अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः।
ą„Æ-मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्‌।
कऄयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।
ą„§ą„¦-तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्‌।
ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।
ą„§ą„§-तेषामेवानुकम्पार्ऄमहमज्ą¤žानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्ऄो ज्ą¤žानदीपेन भास्वता।
ą„§ą„Ø-परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्‌।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्‌।
ą„§ą„©-आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तऄा।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे।
ą„§ą„Ŗ-सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः।
ą„§ą„«-स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्ऄ त्वं पुरुषोत्तम।
भूतभावन भूतेश देवदेव ą¤œą¤—ą¤¤्पते।

  श्री भगवान्‌ बोले- हे महाबाहो! तुम मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचन को सुन, जिसे मैं तुą¤े अतिशय प्रेम रखने वाले के लिą¤ हित की ą¤‡ą¤š्छा से कहूँगा।
  ą¤®ेरी इस उत्पत्ति को अर्ऄात्‌ लीला से प्ą¤°ą¤•ą¤Ÿ होने को न देवता लोग जानते हैं और न महर्षिजन ही जानते हैं, क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं का और महर्षियों का भी आदिकारण हूँ।
  ą¤œो भी ą¤…ą¤œą¤Ø्मा अर्ऄात्‌ वास्तव में जन्मरहित, अनादि ą¤”र लोकों का महान्‌ ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ą¤žानवान्‌ पुरुष संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।
  ą¤Øिश्चय करने की शक्ति, यऄार्ऄ ज्ą¤žान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इंद्रियों का वश में करना, मन का निग्रह तऄा सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय तऄा अहिंसा, समता, संतोष तप ą¤¦ान, कीर्ति और अपकीर्ति, ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुą¤ą¤øे ही होते हैं।
  ą¤øात महर्षिजन और चार उनसे भी पूर्व में होने वाले सनकादि तऄा स्वायम्भुव आदि चौदह मनु- ये मुą¤ą¤®ें भाव वाले सब-के-सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुą¤ हैं, जिनकी संसार में यह संपूर्ण प्रजा है।
  ą¤œो भी पुरुष मेरी इस परमैश्वर्यरूप विभूति को और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है, वह निश्चल भक्तियोग से युक्त हो जाता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
  ą¤®ैं ही संपूर्ण ą¤œą¤—ą¤¤्‌ की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुą¤ą¤øे ही सब ą¤œą¤—ą¤¤्‌ चेष्टा करता है, इस प्रकार ą¤øą¤®ą¤ą¤•ą¤° श्रद्धा और भक्ति से युक्त बुद्धिमान्‌ भक्तजन मुą¤ परमेश्वर को ही निरंतर भजते हैं।
  ą¤Øिरंतर मुą¤ą¤®ें मन लगाने वाले और मुą¤ą¤®ें ही प्राणों को अर्पण करने वाले ą¤­ą¤•्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जानते हुą¤ तऄा गुण और प्रभाव के साऄ मेरा कऄन करते हुą¤ ही निरंतर संतुष्ट होते हैं और मुą¤ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं।
  निरंतर मेरे ही ध्यान आदि में लगे हुą¤ और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्त्वज्ą¤žानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुą¤ą¤•ो ही प्राप्त होते हैं।
  ą¤¹े अर्जुन! उनके ही ऊपर अनुग्रह करने के लिą¤ उनके अंतःकरण में स्ऄित हुआ मैं स्वयं ही उनके ą¤…ą¤œ्ą¤žानजनित अंधकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ą¤žानरूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ।
  ą¤…र्जुन बोले, आप तो परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं, क्योंकि आपको सब ऋषिगण सनातन, दिव्य पुरुष ą¤ą¤µं देवों का भी आदिदेव, ą¤…ą¤œą¤Ø्मा और सर्वव्यापी कहते हैं। वैसे ही देवर्षि नारद और असित और देवल ऋषि तऄा महर्षि व्यास भी कहते हैं और आप भी मेरे प्रति कहते हैं।
  ą¤¹े केशव! जो कुछ भी मेरे प्रति आप कहते हैं, इस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्‌! आपके लीलामय ą¤ø्वरूप को न तो दानव जानते हैं और न देवता ही।
  ą¤¹े भूतों को उत्पन्न करने वाले! हे भूतों के ईश्वर! हे देवों के देव! हे ą¤œą¤—ą¤¤्‌ के स्वामी! हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने से अपने को जानते हैं।
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  निरंतर भगवान वासुदेव के ही ध्यान आदि में लगे हुą¤ और प्रेम पूर्वक उनको ही भजने वाले भक्तों को भगवान वासुदेव तत्वज्ą¤žान रूप योग देते हैं जिससे वह भगवान को ही प्राप्त होते हैं। उन भक्तों के ą¤…ą¤œ्ą¤žान जनित अंधकार को भगवान विष्णु, तत्वज्ą¤žान रूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देते हैं।
  भगवान को जिसने तत्वों से जान लिया और भगवान को जिसने प्राप्त कर लिया उसकी सारे सुख और पाप पुण्य सब कुछ भगवान के ही ऊपर है क्योंकि करने और कराने वाला सिर्फ वही है।